अवधेश पांडेय (उप संपादक)गोरखपुर— दशकों पहले फागुन महीने में गांवों में समूह बनाकर गाए जाने वाले फगुआ गीत व गाने वालों की टोलियां अब दिखाई नहीं दे रही हैं ये अब पुराने दिनों की बातों के साथ सिर्फ यादें बनकर रह गई है। गांवों की मिट्टी से भारतीय संस्कृति पर आधारित फगुआ गीतों की धुन अब सुनाई नहीं देती। फगुआ गीत के प्रेमी बुद्धेश पांडेय व उनके सहयोगी रामकिशोर गौड़ ने एक बात चित के दौरान कहा कि हमारी लोक परंपरा को समाहित किए हुए ये फगुआ गीत अब लगभग विलुप्त होने के कगार पर है।कुछ वर्ष पूर्व फागुन महीने की शुरुआत होते ही गांवों में ढोल नगाड़े की धुन पर फगुआ गीत गाने वालों की लंबी टोलियां दिखाई पड़ती थी। कई दर्जन लोगों की टोलियां प्रमुख प्रमुख स्थानों के साथ दरवाजे दरवाजों पर फगुआ गीत गाते देखे जाते थे। इस अवसर पर सारे द्वेष कटुता को भूल अपने आप को एक टोली में समाहित कर लोग आपसी भाईचारा का संदेश देते थे। इसी के साथ पीछे की पीढि़यों को भी एक मिल जुलकर रहने वाले संदेश का यह फगुआ आमंत्रण देता था। वहीं इन गीतों में भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक तथा पारंपरिक सछ्वाव रीति-रिवाजों का झलक देखने को मिलता था। ये गीत हमारी लोक संस्कृति की पहचान होते थे, लेकिन इधर विगत कई वर्षों से गांवों में ढोल मजीरे की आवाज बहुत कम सुनने व दिखने को मिल रही है। महज होली के रस्म अदायगी के तौर पर यह गीत कहीं कहीं सुनने को मिलते हैं। रात भर सुनाई देने वाले ये फगुआ गीत अब पुराने दिनों की बात हो गई है।
अवधेश पांडेय उप संपादक गोरखपुर



