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पाकिस्तान के साथ युद्ध में उलझना भारत के लिए एक खतरनाक भटकाव

= भारत को अपने आर्थिक और सामाजिक विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए और युद्ध जैसे विकल्पों से दूर रहना ही उचित है।
= पाकिस्तान के साथ संघर्ष से भारत की वैश्विक छवि और आंतरिक स्थिरता को नुकसान होता है, इसलिए विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक है।
= वर्तमान में भारत की आर्थिक विकास दर और वैश्विक निवेश को आकर्षित करने की क्षमता उसे एक विकसित राष्ट्र की ओर ले जा सकती है, जिसके लिए शांति और स्थिरता अनिवार्य है।

नेपाल,भारत सिमा संवाददाता जीत बहादुर चौधरी का रिपोर्ट
14/05/2025

काठमाण्डौ,नेपाल – आज भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
हम लगातार प्रगति कर रहे हैं। आने वाले दो दशकों में हम एक मध्यम आय वाले देश बन सकते हैं और तीन से चार दशकों में एक विकसित राष्ट्र। लेकिन यह सब अपने आप नहीं होगा। इसके लिए हमें अपनी अर्जुन दृष्टि बनाए रखनी होगी, स्मार्ट नीतियाँ बनानी होंगी, कड़ी मेहनत करनी होगी और राष्ट्रीय एकता व सद्भाव बनाए रखते हुए आगे बढ़ना होगा।

आज भारत की पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिए — पाकिस्तान नहीं।

लेकिन दुर्भाग्यवश, हमारी बड़ी आबादी पाकिस्तान को लेकर लगातार उत्तेजित रहती है। बँटवारे के घाव, अनेक युद्धों और लगातार आतंकवादी हमलों ने पाकिस्तान को हमेशा चर्चा के केंद्र में बनाए रखा है।

हाल ही में हुए पहलगाम हमले ने देश को आक्रोशित कर दिया। हर किसी ने बदला चाहा। भारत ने जवाबी कार्रवाई की, लेकिन वह पाकिस्तान के नागरिकों या सुरक्षाबलों पर नहीं, आतंकवादी शिविरों पर केंद्रित थी। इससे स्पष्ट हुआ— हमारा उद्देश्य पाकिस्तान को एक सख्त संदेश देना था, युद्ध छेड़ना नहीं।

लेकिन जब पाकिस्तान ने मिसाइल और ड्रोन के माध्यम से जवाब दिया, तब लगा कि हम पूर्ण युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं।

सौभाग्यवश, युद्ध रुक गया।
पर सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कितने अधिक भारतीय पाकिस्तान के साथ खुला युद्ध चाहते थे। मीडिया, खासकर टीवी चैनलों ने ड्रामाई साइरन, नकली खबरें जैसे कि भारतीय सैनिक पाकिस्तान में घुस गए, या कराची बंदरगाह नष्ट कर दिया गया है — इस प्रकार की झूठी खबरें फैलाकर उन्माद फैलाया।

सोशल मीडिया ने भी आग में घी डाला।

ऐसे युद्ध-विरोधी आवाज उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को देशद्रोही, पाकिस्तान समर्थक और कायर कहा गया।

क्या भारत के पास पाकिस्तान जैसे असफल राष्ट्र से लड़ने के अलावा कोई और उद्देश्य नहीं है?

क्या पाकिस्तान के खिलाफ की गई कार्रवाई आतंकवाद के खिलाफ एक संदेश देने के लिए नहीं थी?

फिर हम पूर्ण युद्ध की ओर क्यों बढ़े?
उस युद्ध से हमें क्या हासिल होता? और अगर पाकिस्तान ने गुस्से में आकर हम पर परमाणु हमला कर दिया होता, तो हम कितने नागरिक खोने को तैयार होते? एक हजार? दस हजार? एक लाख?

लेकिन शुक्र है कि सरकार में कुछ शांत और समझदार लोग हैं।
हमें भी अपना सोच वैसा ही रखना चाहिए।

यह 1971 नहीं है। उस समय भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र 118 डॉलर थी, जीडीपी 65 अरब डॉलर और आर्थिक विकास दर 1% से भी कम थी।

उस समय पाकिस्तान को हराना गर्व की बात थी, क्योंकि गर्व करने के लिए और ज्यादा कुछ नहीं था। तब दोनों देशों के पास परमाणु हथियार भी नहीं थे, इसलिए युद्ध सीमित रह सकते थे।

लेकिन यह 2025 है।
भारत की प्रति व्यक्ति आय अब 2,500 डॉलर से ज्यादा है और जीडीपी 3.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुकी है। हमारी अर्थव्यवस्था 6-8% की दर से बढ़ रही है — जो दुनिया में सबसे तेज है।
एप्पल ने अपने ज्यादातर iPhone का उत्पादन चीन से भारत में स्थानांतरित करने की घोषणा कर दी है।
अगर हम स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने में सफल होते हैं, तो यह निर्णय भारत में वैश्विक निवेश को आकर्षित कर सकता है।
क्योंकि कोई भी कंपनी युद्धग्रस्त देश में अरबों डॉलर का निवेश नहीं करना चाहेगी।

कल्पना कीजिए, यदि हमने सोशल मीडिया पर युद्धप्रिय लोगों की बात मानी होती, तो क्या होता?
हमारी प्रगति रुक जाती।
हमारे युवाओं का भविष्य खतरे में पड़ जाता।
और सबसे दुखद — हजारों भारतीयों की जान जाती।

उस युद्ध को जीतकर भी हम क्या साबित करते?
क्या यही कि हमने पाकिस्तान को हरा दिया?
क्या यही हमारा मानदंड होना चाहिए?
एक असफल राष्ट्र पर जीत?
अगर आपको लगता है कि युद्ध जीतने से आतंकवाद खत्म हो जाएगा, तो फिर पिछले युद्धों के बाद क्यों नहीं हुआ?

वास्तव में, पाकिस्तान के साथ कुछ दिनों की लड़ाई ने सिर्फ उसे सुर्खियों में ला दिया।
उसके नेता और सैन्य अधिकारी वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचने में सफल रहे, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे भारत से लड़ रहे थे।
जैसे कोई मशहूर हस्ती अगर किसी ट्रोल को जवाब देती है, तो वह ट्रोल और अधिक प्रसिद्ध हो जाता है।

इसलिए, विवेकपूर्ण निर्णय क्या है?
पाकिस्तान के पास खोने को कुछ नहीं है।
लेकिन भारत के पास बहुत कुछ है।
पाकिस्तान का अस्तित्व ही संघर्ष और लड़ाई पर टिका है।
लेकिन भारत के लिए उसमें उलझना एक खतरनाक विचलन बन सकता है।

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