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नेपाल में (ईस्लाम धर्मावलम्वि)मुसलमान आज बकरीद मना रहे हैं

नेपाल,भारत सिमा संवाददाता जीत बहादुर चौधरी का रिपोर्ट
07/06/2025

काठमाण्डौ,नेपाल – मुसलमानों का दूसरा बड़ा त्योहार बकरीद (ईदुल जुहा) आज देशभर की मस्जिदों में मनाया जा रहा है। ईद-उल-फितर यानी रमजान के 70वें दिन बकरीद मनाने की धार्मिक परंपरा है।

मुसलमान इस दिन सुबह जल्दी नहाकर पास की मस्जिद या ईदगाह में सामूहिक नमाज अदा करने जाते हैं। नमाज अदा करने के बाद एक-दूसरे को बधाई दी जाती है।

इस मौके पर मुसलमान दरबारमार्ग स्थित नेपाली जामे मस्जिद, कश्मीरी मस्जिद समेत देशभर की मस्जिदों और ईदगाहों में उमड़ पड़ते हैं। यह त्योहार उस समय की याद में शुरू किया गया था जब 1440 साल पहले हिजरी कैलेंडर के अनुसार इब्राहिम अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे इस्माइल (उन पर शांति हो) की कुर्बानी देने के लिए तैयार हुए थे।

मुस्लिम धर्मगुरु (मौलाना) रहमत अली कहते हैं कि ऐतिहासिक बकरीद त्योहार का आधार बने इब्राहीम के वंश को 571 ई. में मक्का में जन्मे मुहम्मद सल्लल्लाह ने आगे बढ़ाया।

उन्होंने हदीस नामक धार्मिक पुस्तक की रचना कर इस त्योहार और धर्म के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि ‘यह पुस्तक अब मुस्लिम धार्मिक स्कूलों (मदरसों) में भी पढ़ाई जाती है। मक्का में जन्मे सल्लल्लाह 53 वर्ष की आयु में मदीना चले गए थे। इसकी याद में सऊदी अरब के इन दोनों तीर्थ स्थलों पर बड़ा मेला लगता है।’ इस त्योहार के अवसर पर मक्का और मदीना जाना शुभ माना जाता है। गृह मंत्रालय मक्का और मदीना जाने के लिए हवाई टिकट की व्यवस्था करता है और हज यात्रा का आयोजन करता है। इसके लिए गृह मंत्रालय के अधीन हज समिति सचिवालय की स्थापना की गई है।

मक्का और मदीना नहीं जा पाने वाले तीर्थयात्री भी घर पर बकरीद मनाते हैं। इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य हज यात्रा है। इस त्यौहार पर मुसलमान अल्लाह को खुश करने के लिए धर्म के अनुसार जायज़ माने जाने वाले जानवरों की कुर्बानी देते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, अल्लाह के पैगम्बर इब्राहिम अली सलाम को अपने बेटे इस्माइल की कुर्बानी देने का आदेश मिला था, जो उनकी पत्नी हाजरा से 90 साल की उम्र में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि जब उन्होंने इस आदेश का पालन किया तो अल्लाह प्रसन्न हुए और इस्माइल की कुर्बानी देने के बजाय उन्होंने जन्नत में पले हुए मेढ़े की कुर्बानी दी। इसीलिए मुसलमानों का मानना ​​है कि कुर्बानी की प्रथा आज भी कायम है।

निःसंतान इब्राहिम ने अल्लाह से संतान की कामना की थी। इब्राहिम ने वादा किया था कि अगर अल्लाह उन्हें संतान का सुख देगा तो वे उसकी कुर्बानी देंगे। मुसलमानों का मानना ​​है कि अल्लाह ने उन्हें सपने में कहा था कि वे इसे आजमाने के तौर पर कुर्बान कर दें।

कई जानवरों की कुर्बानी दी गई, लेकिन अल्लाह खुश नहीं हुए। अंत में उन्होंने अपने सबसे प्यारे बेटे की कुर्बानी देकर अल्लाह को खुश करना चाहा। इस मौके पर जब उनकी परीक्षा सफल हुई तो कुर्बानी की जगह इंसान नहीं बल्कि जन्नत में पला हुआ मेमना था।

कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटकर बांटा जाता है। एक हिस्सा गरीब और जरूरतमंद परिवार को दिया जाता है, दूसरा हिस्सा अपने दोस्तों को और तीसरा हिस्सा मुस्लिम धार्मिक मान्यता के अनुसार खुद खाना होता है। इस हिसाब से आज बकरीद का पहला दिन है। मुसलमान इस त्यौहार को सोमवार तक तीन दिन तक मनाते हैं।

नेपाली जामे मस्जिद के सचिव मंसूर हुसैन ने बताया कि मुस्लिम परंपरा के अनुसार इस त्यौहार के तीनों दिन कुर्बानी देना जरूरी है। इस अवसर पर सरकार ने आज सार्वजनिक अवकाश भी घोषित किया है।

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