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कुसे औंसी पर्व: पिता को सम्मान देने का विशेष दिन और पितृ दिवस पर धार्मिक अनुष्ठान

भारत- नेपाल सीमा संवाददाता जीत बहादुर चौधरी की रिपोर्ट

काठमाण्डौ,नेपाल। भाद्रकृष्ण औंसी के दिन मनाया जाने वाला कुसे औंसी पर्व आज पवित्र कुश को घर में लाकर मनाया जा रहा है। सनातन वैदिक हिंदू धर्म के अनुयायी घर-घर की पूजा और पितृकार्य के लिए आवश्यक कुश को पूरे वर्ष भर अपने पास रखते हैं और आज के दिन घर में पूजा करते हैं।

ब्राह्मण शास्त्रोक्त विधि से कुश पूजा करते हैं और उसमें छेद करके जजमान के पास ले जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि घर में कुश रखने से परिवार में समृद्धि आती है। वैदिक सनातन हिंदू भगवान विष्णु के स्वरूप के रूप में कुश, तुलसी, पीपल और शालिग्राम की पूजा करते हैं। साल के 12 औंस में से आज के औंस को कुसे औंस कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन कुश की पूजा की जाती है और उसे छेदकर घर में लाया जाता है।

फादर्स डे 

इस दिन बच्चे अपने पिता को उनकी मनपसंद मिठाइयाँ और भोजन देकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। इसीलिए आज के दिन को ‘पिता का चेहरा देखने’ का दिन और पितृ दिवस कहा जाता है। आजकल, जिनके पिता नहीं हैं, वे काठमाण्डौ के उत्तर-पूर्व में वागमती, चंद्रमती और सूर्यमती नदियों के संगम पर गोकर्णेश्वर उत्तर गया पितृ तीर्थ में जाते हैं और अपने पिता के नाम पर तर्पण और श्राद्ध करते हैं।
रसुवा जिले की वेत्रवती में मृत पिता के नाम पर आज तर्पण, श्राद्ध और सिदा भी दिया जाता है।

पितृदेवो भवः की शास्त्रीय उक्ति के अनुसार धार्मिक मान्यता है कि इस दिन मृत पिता के नाम पर मीठा भोजन कराने और तर्पण, श्राद्ध और सिदा दान करने से जीवित पिता को प्रसन्न करने से सुख मिलता है। गोकर्ण में आज मेला भी लगता है।

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